हर साल गाँव के बुज़ुर्ग मेरे पास 15-एच फॉर्म भरवाने आते हैं। यह सिलसिला उनके जीवन की अनकही कहानियों और अनुभवों को सुनने का ज़रिया बन गया है। उनके साथ बिताए ये कुछ पल उनकी ज़िंदगी के उन पहलुओं को सामने लाते हैं, जो अक्सर अनकहे रह जाते हैं। लेकिन इस बार, कुछ परिचित चेहरे नहीं दिखे। उनकी अनुपस्थिति ने एक अजीब-सा खालीपन भर दिया।
मन में सवाल उठा—क्या कोई बीमारी आड़े आ गई है? या शायद वे भूल गए होंगे कि हर साल की तरह इस साल भी उन्हें फॉर्म भरकर बैंक में जमा
करवाना है? मुझे बेचैनी ने घेर लिया। फिर सोचा, क्यों न उनके घर जाकर हालचाल पूछ लूँ?
सबसे पहले, मैं जगदीश ताऊ के घर गया। पूछने पर उन्होंने थकी हुई आवाज़ में कहा, “बेटे को दिल्ली में फ्लैट चाहिए था। मैंने सारी एफडियाँ तुड़वा दीं। मानो एफडियाँ नहीं, अपनी हड्डियाँ तुड़वा ली हों। बेटा अब दिल्ली में बस गया है, और मैं यहाँ टूटी हड्डियों के जुड़ने का इंतज़ार कर रहा हूँ।” उनकी आवाज़ में ऐसा दर्द था, जो मुझे भीतर तक झकझोर गया।
इसके बाद, मैं सत्य ताऊ के घर पहुँचा। उनका बेटा दुकान खोलना चाहता था। ताऊजी ने अपनी उम्रभर की कमाई बेटे की हार्डवेयर की दुकान में लगा दी। अब उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी, जो पहले हुआ करती थी। फिर मैं रमेश दादा के घर गया। गाँव में उनका घर ही कच्चा था। लोग अक्सर उन्हें उनके कच्चे मकान का एहसास दिलाते रहते थे। आखिरकार, उनकी सारी जमा पूँजी कंक्रीट के दो-मंज़िला ढेर में बदल गई। लेकिन वह दो-मंज़िला मकान रमेश दादा के चेहरे की मुस्कान लौटा सका, ऐसा नहीं लगा। मदन ताऊ से मिलने गया तो वहाँ एक अलग ही कहानी थी। ताऊजी हृदय रोगी थे और उन्हें बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते थे। उनके बेटे ने एक बड़ी कार खरीद ली। अब बसों की धक्का-मुक्की से निजात मिल गई और बड़ी कार से गाँव में रुतबा भी बढ़ गया। लेकिन ताऊजी के चेहरे पर खुशी की जगह एक गहरी उदासी थी। शंकर चाचा के घर भी गया। उन्होंने अपनी इकलौती एफडी पोते के नाम कर दी थी। बहू की इच्छाओं के आगे उनकी एक न चली। उनकी आवाज़ की उदासी बता रही थी, “मानो एफडी के साथ-साथ आत्मा का एक हिस्सा भी चला गया हो।”
तीर्थ, विजय, और बाली दादाओं की कहानी भी इससे अलग न होगी, यह सोचकर मैं उनके घर नहीं गया। मेरा मन भी विचलित हुआ। मैंने सोचा कि मैं भी अपने पिताजी से कहूँ कि कुछ एफडियाँ तुड़वाकर घर की दूसरी मंज़िल बनवा लेते हैं। गर्मी के दिनों में एक-मंज़िला मकान भट्ठी जैसा हो जाता है। दूसरी मंज़िल बनने से राहत मिलेगी और हमारा जीवन थोड़ा आरामदायक हो जाएगा। यह सोचते हुए मैं मन में उथल-पुथल लिए घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँचा तो देखा कि बिशन अंकल मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी एफडियों का ज़ख़ीरा बढ़ चुका था। मैंने दबे स्वर में पूछा, “सभी ने अपनी एफडियाँ तुड़वा दीं, पर आपने तो बढ़ा लीं?” इस पर बिशन अंकल ताज़ा खिले फूल-सा हँसते हुए बोले, “बेटा, ये केवल एफडियाँ नहीं हैं, ये बुज़ुर्गों का मनोबल हैं। देखने में तो कागज़ का हल्का-फुल्का टुकड़ा हैं, पर हर गुजरते दिन के साथ इनका बढ़ता वज़न हमारे सम्मान और आत्मविश्वास को बढ़ा देता है। ये अपनों से रिश्ता बनाए रखने का एक ज़रिया हैं। खालीपन में मुस्कान की मात्रा बढ़ा देती हैं ये एफडियाँ। अपने ही घर में खुद को बोझ महसूस न करने की ताकत देती हैं ये।”
“और बेटा,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “पैसा होगा, तो बीमारी-समारी में बच्चों का उदास चेहरा नहीं देखना पड़ेगा। दस-तेरह के लिए भी तो पैसा चाहिए। तुम्हें पता ही है, मरना भी कहाँ सस्ता है! इसलिए मैंने तय किया है कि मैं आखिरी वक्त तक इन्हें बचाकर रखूँगा।”
पास बैठे पिताजी ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा, “आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। मेरा मानना है कि इंसान को अपने हिस्से की छाँव भी बचाकर रखनी चाहिए। वैसे भी मरने के बाद सब कुछ बच्चों को ही तो मिलना है। ये ज़मीन-ज़ायदाद, ये धन-दौलत आज भी उनकी, कल भी उनकी।” पिताजी की बात सुनकर मैं चुपचाप 15-एच फॉर्म भरने में व्यस्त हो गया। लेकिन मन में एक प्रश्न बार-बार दस्तक देता रहा—
क्या अपने हिस्से की छाँव बचाकर रखना वाकई इतना जरूरी है, या इसे साझा करना भी उतना ही अहम है? दिल तो किया कि पिताजी से पूछूँ, लेकिन न जाने क्यों, खामोश रहना ही बेहतर लगा।
पता – गाँव पखरोल, डाकघर- सेरा, तहसील- नादौन,
जिला- हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश-177038