रतनपुर गाँव के लोग बहुत ही सुखी और संपन्न थे। वहाँ चारो तरफ बहुत ही हरियाली और खुशहाली छायी हुई थी। उसी गाँव में बसंत और सुरेश नाम के दो अनाथ बच्चे भी रहा करते थे। दोनों के माता पिता हैजा की महामारी में काल के ग्रास बन गए थे। उसके बाद निकट के सगे सम्बन्धियों ने जमीन जायदाद हड़पने के चक्कर में उन दोनों को घर से निकाल दिया था। शुरू शुरू में तो गाँव के लोगों ने उनकी थोड़ी बहुत मदद करी। मगर यह जब रोज की बात बन गयी तो कोई कब तक मदद करता। ठण्ड का मौसम भी आ गया था, तो अब पेड़ के नीचे या तबेले में निर्वाह करना कठिन होता जा रहा था। ऐसे में कहीं सहारा न मिलने पर उन्होंने गांव के मंदिर की शरण ली। जहाँ उन्हें सिर छुपाने की जगह तो मिली ही साथ में
पेट भरने के लिए भी कुछ न कुछ मिल ही जाता था। इस तरह सुख दुःख में साथ रहते रहते दोनों बहुत पक्के दोस्त बन गए।
हँसते खेलते दोनों खूब खुश रहते। मंदिर की सफाई भी कर दिया करते तो मंदिर के पुजारी जी की अतिरिक्त कृपादृस्टि भी उन पर रहने लगी। अब जब पेट भरने लगा तो उनको नए नए कपडे और साबुन तेल का भी शौक चढ़ने लगा। अब इसके लिए वह दोनों अतिरिक्त आय की सोची । तब वह गांव के बाग़ बगीचों से फूल तोड़ कर उसकी माला बना कर मंदिर में बेचने लगे। अब क्या था? नित नए नए कपड़ों में सजने सवरने लगे।
इसी तरह उनका जीवन हँसी ख़ुशी बीत ही रहा था, मगर उनकी ख़ुशी को किसी की नजर लग गयी। सुरेश को चेचक ने आ घेरा। जिसकी वजह से उसकी दोनों आँखों की रोशिनी जाती रही। गाँव के वैध हकीम से बहुत इलाज कराया मगर उससे बिलकुल भी फायदा नहीं हुआ। इतनी परेशानी में भी बसंत लगातार सुरेश का सहारा बन कर खड़ा रहा। वो उसके हर दैनिक कार्य में उसकी मदद करता था । इसी तरह दोनों के जीवन की गाड़ी धीरे धीरे पटरी पर आने लगी ही थी कि एक और विपदा उन पर आन पड़ी।
उस वर्ष बिलकुल ही वर्षा न होने पर खेत खलिहान सब सूख गए थे। तालाब और कुएं भी सूखने लगे। लोग परेशान हो कर आसपास के गांव और कस्बों को प्रस्थान करने लगे। ऐसे में बसंत और सुरेश का भी अब रतनपुर में रहना कठिन होता जा रहा था। ऐसे में दोनों दोस्तों ने अपना गाँव छोड़ कर कहीं और रहने का फैसला किया। इसी उद्देश्य से दोनों अपना गांव छोड़ कर भूखे प्यासे ही पास के मलय देश के मुख्य द्वार की सीमा तक मुश्किल से पहुंचे ही थे कि सुरेश भूख और गर्मी से परेशान हो कर मूर्छित हो गिर पड़ा। बसंत ने उसको वही एक बरगद के पेड़ कि नीचे लिटा दिया। और खाने पीने की चीज लाने के लिए वह गांव की ओर बढ़ चला। उसने सुरेश से उसका यहीं पर इंतजार करने को कहा था। मगर मूर्छावस्था के कारण सुरेश ने कुछ भी नहीं सुना था।
चलते चलते बसंत मलय देश के बाजार में पहुंच गय। एक अजनबी को देख कर सब तरह तरह के प्रश्न पूछ रहे थे। जिससे कि बसंत को बहुत ही चिढ हो रही थी क्योकि वह जल्द से जल्द अपने दोस्त के पास कुछ भी खाने पीने का सामान ले कर जाना चाहता था, जोकि मूर्छित अवस्था में बरगद के पेड़ के नीचे लेटा हुआ था। जब लोगों ने उससे पुछा कि ए पथिक कहाँ से आये हो और कहाँ जाना है? तो उसने जवाब दिया लंका से आएं हैं और मंका को जाना हैं । लोगों ने फिर प्रश्न दागा कि भैया तनिक यह भी बताना कि लंका का क्या हाल है? तो बसंत ने तुरंत उस व्यक्ति की जेब से माचिस निकाली और सामने किताब कि दुकान में आग लगाने लगा। अरे अरे यह क्या कर रहे हो भाई? लोगों के पूंछने पर उसने बताया कि मैं तो आप लोगों को बता रहा हूँ कि लंका का यही हाल है। यह देख कर नगरवासी क्रोधित होने लगे।
बसंत ने तुरंत लोगों से कहा कि कृपया करके आप लोग मुझे किसी हलवाई कि दुकान पर ले चलिए। मैं तीन चार दिनों का भूखा हूँ और मेरा दोस्त भूख प्यास से मूर्छित हो कर गिर पड़ा है। ऐसा सुन कर क्रोधित गांववासी शांत हो कर उसको पास ही ननकू हलवाई के पास पंहुचा दिया। दूकान में तरह तरह कि मिठाई देख कर बसंत के मुँह में पानी आने लगा और उसकी भूख और ज्यादा ही बढ़ने लगी। मगर वह अच्छी तरह से जानता था कि उसके पास मात्र पच्चास पैसे ही है और उनसे पहले अपने मित्र को ले जा कर कुछ खाने पीने को देना। है। दुकान में बहुत भीड़ थी। एक नयी तरह कि मिठाई को देख कर जब बसंत ने उसका नाम पुछा तो ननकू हलवाई बोला कि “खाजा”। इतना सुनते ही भूखे बसंत को कुछ न सूझा, वह गपागप मर्तबान से खाजा निकाल कर खाने लगा। हलवाई का ध्यान तब अन्य ग्राहकों से हठ कर जब बसंत की तरफ गया तो वह चीख उठा यह क्या कर रहे हो भैया? तो बसंत बोला आप ने ही तो कहा था खाजा तो मै खा गया। अब काहे को चिल्ला रहे हो भाई? जब हलवाई ने पैसा निकालने को बोला तो बोला कि मेरे पास तो सिर्फ पच्चास पैसे ही हैं। हलवाई पुलिस बुला कर उसको जेल में डलवाने कि सोच ही रहा था कि अचानक उस देश के राजा के मंत्री लाव लश्कर के साथ वहाँ बसंत को राजा के समक्ष ले जाने को पहुंचे हुए थे। बसंत बड़ी असमजस्य सी स्थिति में था, क्योकि उसको तो पूरा किस्सा नहीं पता था।
पूरा किस्सा यह है कि रतनपुर कि तरह ही मलय देश भी एक संपन्न राज्य था जिसका राजा रूपसिंह बहुत ही कुशल और दयालु था। उसकी प्रिय रानी पद्मावती का देहांत दो महीने पहले हो गया था। जिसके कारण वह बहुत दुखी था और राज काज में भी उसका मन नहीं लगता था। ऊपर से उसकी अठारह वर्षीय राजकुमारी माँ मृत्यु के पश्चाद बिलकुल ही गुमसुम और उदास हो गयी थी। हँसना मुस्कराना तो दूर की बात है वह किसी से बात तक भी न करती थी। यहाँ तक कि उसने खाना पीना सब त्याग दिया। राजा और उसके मंत्री तरह तरह का उपाय कर के जब थक गए तो राजा ने अपने मंत्रियों से मंत्रणा कर के पुरे नगर में यह घोषणा करी थी कि जो भी नौजवान मेरी राजकुमारी के मुख पर मुस्कराहट वापिस लौटा देगा, उससे ही मै राजकुमारी मालविका का विवाह कर दूंगा। और वो नौजवान ही मेरे बाद मलय देश का राजा बनेगा। बसंत जब ननकू हलवाई के यहाँ जा गपागप खाजा खाये जा रहा था, उस वक़्त राजकुमारी राजमहल कि छत पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। जिसको देख कर वह जोर जोर से हँसने लगी। उसकी हँसी कि आवाज सुन कर राजा रूप सिंह दौड़े दौड़े छत पर पहुंचे। सामने का दृश्य देख कर उन्होंने तुरंत ही अपनी घोषणा के मुताबिक़ उस नौजवान से अपनी राजकुमारी के विवाह का निर्णय लिया।
उन्होंने तुरंत ही उस अजनबी नौजवान को अपने समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया। उसके आदेश का पालन करते हुए राजा के मंत्री बसंत को लेने ननकू हलवाई कि दूकान पर पहुंचे हुए थे। और बसंत को ले कर जब राजा के सामने महल में प्रस्तुत किया गया और उसका हाल जानने के बाद राजा ने अपनी घोषणा के बारे में बताया। फिर अपने महल के दास को आदेश दिया कि इस नौजवान को नहला धुला कर स्वक्छ कपडे धारण करवा कर उत्तम भोजन पेश किया जाए । बसंत बोला महराज मैं आपकी सब आज्ञा का पालन करूँगा मगर उससे पहले आपको मेरे मित्र को यहाँ बुलवाना होगा, जिसको मैं मूर्छित अवस्था में नगर द्वार के पास बरगद के पेड़ के नीचे छोड़ कर आया हूँ। उसके बिना मै आपका कोई आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकता हूँ। उसके ऐसा कहने पर राजा ने तुरंत ही अपने मंत्रियों को नगर द्वार पर भेज दिया।
उधर सुरेश जब मूर्छित बरगद के पेड़ के नीचे पड़ा हुआ था तो किसी पथिक ने दयावश उस पर पानी के छींटे डाले और होश में आने पर उसे पानी पिलाया। जब उसको समझ में आया कि वह अँधा है और उसका कोई भी ठिकाना नहीं तो उसको पास के मंदिर तक पंहुचा दिया। और मंदिर से प्रशाद ले कर सुरेश को कुछ खाने को दिया जिससे कि उसकी जान में जान आयी। खाने पीने के बाद भी वह बहुत दुखी था कि उसका मित्र बसंत अनजान देश में ला कर उसको अकेला छोड़ कर कहाँ चला गया।
इधर राजा के मंत्री को भी जब कोई व्यक्ति नहीं मिला तो उन्हें खाली हाथ ही महल आना पड़ा। बसंत ने स्वयं भी अपने मित्र को खोजने का बहुत प्रयास किया। जब सब तरफ से निराशा ही हाथ लगी तो अंत में उसको राजा का आदेश मानते हुए राज कुमारी मालविका से विवाह करना पड़ा। सारे ऐशोआराम के बावजूद वह अपने मित्र के बिना दुखी सा रहता था। एक वर्ष बाद जब उन दोनों को पुत्रधन की प्राप्ति हुई तो दोनों पति पत्नी भगवान् के दर्शन हेतु उसी मंदिर में गए जहाँ सुरेश ने अपना आश्रय बनाया हुआ था। भगवान् के दर्शन के बाद और मंदिर के पुजारी से बच्चे को आशीर्वाद दिला कर जब वह दोनों गरीबों को भोजन वस्त्र बाँट रहे थे तभी बसंत कि दृस्टि अपने मित्र सुरेश पर पड़ी। वह ख़ुशी के मारे तुरंत ही उसके गले लग गया और उससे पूछने लगा की ऐ मित्र तुम कहाँ चले गए थे? फिर उसने अपना सारा किस्सा सुनाया और अपनी पत्नी और बच्चे का भी परिचय करवाया। और उसके बाद अपने मित्र सुरेश का हाँथ पकड़ कर महल में ले गया। सूंदर वस्त्र धारण करवाया और उत्तम भोजन ग्रहण करने को दिया। अब दोनों मित्र महल की सारी सुख सुविधा के साथ आराम से जीवन व्यतीत करने लगे।
पता – ( हरियाणा )