आज पगार का दिन है। माँ अंगीठी में कोयला डालकर बाबा का रास्ता देख रही थी। बाबा आज पगार लेकर आएंगे, तो माँ जल्दी से राशन लाकर खाना बनाएगी और मुनिया को खिलाएगी। मुनिया भूख के कारण बार-बार माँ से खाना माँग रही थी, पर माँ बेबस थी। किसी से उधार माँग भी नहीं सकती थी क्योंकि पिछला कर्ज़ तो वापस किया ही नहीं, तो अब कहाँ से लाएगी? कोयले की अंगीठी जल-जलकर राख होने को थी। रात के 11 बजे दरवाजे पर दस्तक सुनकर माँ ने झट से दरवाजा खोला। आँखों में एक चमक लिए बोली, “आ गए तुम? राशन लाए? पैसे दो, मैं दुकान से कुछ ले आऊँ। मुनिया को खिलाऊँ। खाना माँगते-माँगते सो गई है। मैं अपनी बेटी को भूखे पेट सोने नहीं दूँगी।” बाबा लड़खड़ाते कदमों से अंदर आए और चिल्लाए, “चल हट! बड़ी आई पैसे माँगने वाली! जिसको देखो, उसे
सिर्फ पैसा चाहिए और कुछ नहीं! कहाँ से दूँ पैसा? साहूकार ने मेरे सारे पैसे ले लिए। मेरे पास कुछ नहीं है!”
माँ ने तड़पकर कहा, “हाँ हाँ, लुटाओ कमाई इस शराब के लिए! भले परिवार मरे या जिए, तुम्हें क्या?”
“ये… ज्यादा लेक्चर मत दे, समझी? हट यहाँ से! मैं अभी और शराब पिऊँगा! तू कौन होती है रोकने वाली?”
मुनिया आवाज़ सुनकर उठ बैठी। “माँ, बाबा आ गए! अब तुम खाना बनाओगी न?”
माँ की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। माँ को रोता देख मुनिया ने उसके आँसू पोंछे और कहा, “माँ… माँ, तुम मत रोओ। मैं कुछ नहीं माँगूँगी। मैं सो जाऊँगी… मैं सो जाऊँगी।”
यह कहते हुए मुनिया माँ की गोद में सिर रखकर सोने की कोशिश करने लगी। उधर, बाबा शराब की बोतल हाथ में लिए ज़मीन पर लुढ़क गए। बोतल छाती से चिपकी ज़िंदगी और भूख को चिढ़ा रही थी।
बार-बार माँ ऊपर देखते हुए ईश्वर से पूछ रही थी, “तूने दुनिया में शराब क्यों बनाई? क्यों बनाई?” और सिसक-सिसक कर रो रही थी।
पता – श्रीमती डॉ एस्तर ध्रुव ‘आशा’
बी/36 कोटा कालोनी, सांई मंदिर के, पीछे रायपुर (छग)
पिन न. 492010