“काफल पक्कू” उत्तराखंड का एक पक्षी है। इस पक्षी के बारे में पुराणों में एक कथा प्रचलित है।
एक समय की बात है, चैत का महीना था और बहुत सारे काफल फल पक चुके थे। उत्तराखंड के एक गाँव में एक माँ और बेटी जंगल गए। घास और लकड़ी इकट्ठा करने के बाद उन्होंने काफल भी तोड़े और फिर घर लौट आए। उस समय जीवन बहुत गरीबी में बीतता था। बेटी को भूख लगी थी और रसीले काफल देखकर उसने कहा, “माँ, चलो ना, काफल खा लेते हैं।” लेकिन माँ ने कहा, “बेटी, मुझे खेत में जाना है। गेहूँ काटने के बाद जब मैं घर लौटूँगी, तब हम साथ बैठकर काफल खाएँगे। तुम तब तक सिलबट्टे में नमक पीसकर रख लेना।”
माँ के चले जाने के बाद बेटी ने माँ के कहे अनुसार सारा काम किया। उसने नमक-मिर्च पीसकर रखा और माँ के आने की राह देखने लगी कि कब माँ आएगी और फिर वे काफल खाएँगे।
कुछ समय बाद माँ घर लौटी। जब उसने काफल की टोकरी उठाने के लिए अंदर देखा, तो पाया कि टोकरी आधी खाली लग रही थी। उसने बेटी से पूछा, “बेटी, तुमने काफल खा लिए क्या?”
बेटी ने जवाब दिया, “नहीं माँ, मैंने एक भी काफल नहीं खाया।”
धूप से लौटी थकी हुई माँ को यह देखकर बहुत गुस्सा आ गया। बिना कुछ सोचे-समझे उसने बेटी को जोर से धक्का दे दिया। सिर पर चोट लगने की वजह से बेटी बेहोश हो गई और उसकी मृत्यु हो गई।
बेटी को बहुत हिलाने के बाद भी जब वह नहीं उठी, तो माँ का ध्यान दोबारा काफल की टोकरी पर गया। इस बार उसने देखा कि टोकरी पूरी भरी हुई थी। माँ को समझ आया कि धूप की गर्मी के कारण काफल सिकुड़ गए थे, जिससे वे कम दिख रहे थे। लेकिन जैसे ही शाम हुई और ठंडी हवा के साथ नमी आई, काफल फिर से फूल गए और टोकरी भर गई।
अपनी ही बेटी की मृत्यु का सदमा माँ सहन नहीं कर सकी, और उसी समय उसकी भी मृत्यु हो गई।
कहते हैं कि माँ-बेटी दोनों चिड़िया बन गईं, जिन्हें आज भी उत्तराखंड में “काफल पक्कू” के नाम से जाना जाता है। यह चिड़िया चैत के महीने में, जब काफल पकते हैं, तब दिखाई देती है।
कहते हैं कि बेटी रूपी चिड़िया “काफल पाको, मै नि चाखो” (काफल पक गए, लेकिन मैंने नहीं खाए) कहकर पुकारती है, और माँ रूपी चिड़िया उत्तर देती है, “पूरे हैं बेटी, पूरे हैं” (हां बेटी, काफल पूरे हैं)।
पता – श्रीमती रम्भा शाह w/of श्री हरीश चंद्र शाह
नजदीक , स्टेट बैंक गैड़ी भवन , गैरसैंण।