hindi kavita

मनोज कुमार व्यास की कविता – भारत भूमि कोटि-कोटि प्रणाम

भारत भूमि कोटि कोटि प्रणाम हे भारत भूमि! तुम्हें कोटि कोटि प्रणाम तेरी सात्विक धरा को बारम्बार प्रणाम।। तेरे उत्तर में हिमालय पर्वतमाला है, जिसका हर जर्रा मन मोहनेवाला है यहाँ गंगा और यमुना का पावन संगम यहाँ सभी चराचर स्थावर और जंगम यहीं अवतरित हुए श्रीकृष्ण व राम। भारत ऋषियों मुनियों की तपोभूमि है […]

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कविता

मां दुर्गा

मां दुर्गा प्यारी मैया मेरी आ जाओ मेरे द्वार जीवन मेरा कर दो भव सागर पार मैया हम जन्म से तेरे है भक्त प्यारे तू सदा जीवन के दुख मिटा दे हमारे मैया तुमसे ही है यह जीवन हमारा मेरी मैया तुम ही हो मेरा जीवन सहारा मैया हम तेरे बालक बड़े अल्पज्ञानी मैया यें

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कवि वीरेंद्र कुमार की कविता – साहस

आओ जागे नींद से फैला है दिनकर का मनहर आलोक मिटा अन्धकार हुआ धरा पर उजियारा आओ करे साहस चले राह करे मन से मन की बात मिले हम हो मिलन मिल कर गाये मंगल गान बना रहे साहस से मान न डरें न डरायें बनाये धरा को साहस से मन भावन सुन्दर उपवन हो

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कविता

स्कूल चलो

स्कूल चलो चलो बच्चो, स्कूल चलो, ज्ञान की ज्योति जलाने चलो। अक्षर-अक्षर सीखेंगे हम, नव उजियारा पाएंगे हम। किताबों में छिपे हैं मोती, इनसे होगी मन की ज्योति। गिनती, कविता, खेल अनोखे, शिक्षा देंगे रूप अनूठे। माँ-बाबा का सपना प्यारा, पढ़-लिख बनना सितारा। आओ मिलकर वचन निभाएँ, नित्य स्कूल को रोज़ जाएँ। “विद्या ही सबसे

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कविता

सत्य कि झलक दिखाने वाला

उत्साह हूँ आनंद हूँ अंधकार को चीरता रवि हूँ सत्य की झलक दिखाने वाला मित्रों मैं एक कवि हूँ सत्य पथ पर चलता हूँ आलोचना से कब डरता हूँ प्रेरित हो इस जगत से अपनी रचनाये लिखता हूं दिखाता सबकुछ समाज का धरती पर समाज का छवि हु सत्य की झलक दिखाने वाला मित्रो मैं

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माँ का आँचल है संसार

मां का आंचल है संसार जिसमें है दुनिया का प्यार धूप लगे तो मां का आंचल घनी छांव बन जाता है भूख लगे तो मां का आंचल बच्चे का व्यंजन बन जाता है मां का आंचल प्रेम की छाया मां का आंचल प्रेम की धार मां के आंचल में सब सुख हैं मां का आंचल

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कविता

तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने

तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने , हथेली में रेखाएं नहीं रंग होते हैं शामें बतियाती हैं , सहर संग खतों से भी झरते हैं , पारिजात के पुष्प तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने , कितना सुकून देती है , दुखों की चोरी कितना ज़रूरी है , किसी मोड़ पर ठहरना भी केवल मौन से ,

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कविता

हाय रे ये गरीबी……..!!

गरीबी…….!! अक्सर राह चलते बदतर हालात में भिखारी मिल जाते हैं! उनकी जिंदगी नर्क से भी अधिक बदतर होती हैं, जो उनके पिछले जन्मों के कुकर्म घोर पाप का दंड हैं, जो आज वर्तमान जीवन में विवश होकर लाचारी में जिंदगी काट रहे हैं…..!! कलम…. आतुर हो उठ चल पड़ी और चंद पंक्तियों को धागे

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कविता

स्वर्णिम काव्य-कथा प्रतियोगिता

रचना – 1 रचना का शीर्षक-गृह लक्ष्मी बिन घर भी सूना लगता है। नारी जहां पूंजी जाए देवों का निवास हो, नारी जिस घर में सुख समृद्धि का वास हो। नारी बिन तो सब कुछ अधूरा लगता है, गृह लक्ष्मी बिन घर भी सूना लगता है।। 1/नारी हांड़ मांस का पुतला मात्रा नहीं है, अपनी

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अपना नव वर्ष मनाएंगे

अपना नव वर्ष मनाएंगे हवा चली पश्चिम की सारे कुप्पा बन कर फूल गये सन ईस्वी तो याद रहा अपना संबत भूल गये चारों तरफ नये साल का ऐसा मचा है हो-हल्ला बेगानी शादी में नाचे जैसे दिलदीवाना अब्दुल्ला धरती ठिठुर रही सर्दी से घना कुहासा छाया है कैसा यह नववर्ष है जिससे सूरज भी

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कविता

अनकहे जज़्बात

शब्द अधूरे लब्ज़ अधूरे, तुम बिन अधूरे है सुर सारे संगीत के मेरे आकर बस जाओ जो तुम इसमें गुनगुनाऊं मै तुमको इसके हर सुर में कुछ शब्दो में तुझे निहारूं कुछ में तेरा मासूम सा चेहरा कुछ सुरों में ढूंढू हंसी तेरी कुछ सुरों में वजह तेरी खामोशी की शब्द अधूरे लब्ज़ अधूरे तुम

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