कविता

कल्पनाओं का वृक्ष

मन की भूमि पर अंकुरित हुआ एक नन्हा पौधा कितना कोमल,कितना प्यार,कितना सुंदर है ये पौधा जड़े गहरी, तना मजबूत, टहनियां झूल रही है मदमस्त सी परिश्रम की बूंदों से हर क्षण बढ़ रहा है ये पौधा एक दूजे को साथ लेकर बढ़ रही है टहनियां पाकर प्रीत हवा का झोंका झूम रही है टहनियां […]

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कविता
निर्मेष

नदियों का उधार

कस्बे के कोलाहल से दूर सिवान था सुदूर काम से लौटते मजदूर पर तुमसे मिलने का सुरूर I सुहानी सुरमयी शाम आज भी है याद तेजी से ढलती शाम चाँदनी आने को करती फ़रियाद I हमारे मिलन ने उसे रोक रखा था उसने तारों का वास्ता दिया उदास मैंने तुमको विदा किया। समय पंख लगा

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कविता

मैंने लिखा इसलिए नहीं….

लिखना चाहता अगर समाज को, मैं तो, लिख देता सारे अच्छाइयों को कुछ चंद आधे पन्ने पर तनिक सा स्याही समाप्त होता बस, क्योंकि, बहुत कम है अच्छाई इस समाज में… लिखा इसलिए नहीं, क्योंकि पल भर में ही समाप्त हो जाते पन्ने और स्याही मेरे अगर करता मैं वर्णन बुराईयों का, शायद बहुत बुराइयां

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कविता
इंजी. रत्नेश गुप्ता

पीली बसें

सड़क पर दौड़ती पीली बसें नोनीहालों को ले जाती पीले बसें सड़क पर मौत का तांडव नजर आती पीली बसें बेतारतीब दौड़ती पीली बसें ट्रैफिक नियम को धता बताती पीली बसें सकरी गलियों में दौड़ती पीली बसें

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कविता
किरण बैरवा

किरण बैरवा की कविताएँ

वो ही तो हूँ मैं   गुजार दिए होंगे दिवस, मास, वर्ष जो एक रात ना कट सके, वो पल ही तो हूँ मैं जाने कितने ही लोगों से कितनी ही दफां की होगी बातें हृदय की सुन सकूॅं, वो शख्स ही तो हूँ मैं जीवन में बिताए है हसीन पल सबके साथ जो कभी

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कविता
मोनिका नौटियाल

हम और बचपन

बचपन की मीठी यादों को हम दिल में लिये चलते हैं | जिस घर में रहा करते थे उस घर को याद किया करते हैं || माँ के हाथो से पिटाई पापा के हाथों से मिठाई | बहिन भाई से लड़ाई उन सभी बातो को याद किया करते हैं || बचपन भी क्या था, न

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कविता
इंजी. रत्नेश गुप्ता

जब तुम इस धरा पर आई थी

जब तुम इस धरा पर आई थी घर में मातम छाया था तुम्हारी दीदी के बाद एक और लड़की घर में आई थी मम्मी के चेहरे पर दबी हुई खुशी थी एक गुड़िया के रूप में उनकी छवि फिर से आई थी पापा के लिए एक नन्ही परी फिर से आई थी रिश्तेदार लोग आए

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कविता
इंजी. रत्नेश गुप्ता

हमारे साथ ऐसा ही होता है

हम लड़के हैं जनाब, हमारे साथ ऐसा ही होता है कोई दहेज एक्ट में फंस जाता है कोई अतुल सुभाष की तरह घुट-घुट के मरता कोई मानव शर्मा की तरह पुरुषों की व्यथा कहता है कोई सौरव राजपूत की तरह ड्रम में कटा और मारा जाता है हम लड़के हैं जनाब, बचपन से घर की

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कविता

तीरगी मिटेगी उजाला भी आएगा

“ये तीरगी मिटेगी उजाला भी आएगा यानी कि कामयाबी भरा सवेरा भी आएगा राहों की मुश्किलों सें हार मत मानना, तेरी मंज़िल मिलेगी मिलने का मज़ा भी आएगा l”

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कविता

पधारे श्री राम प्रभु द्वारे हमारे

जय श्री राम 🙏 🙏 खुल गए भाग्य हमारे पधारे श्री राम ,द्वारे हमारे अंगना रंगोली सजाओ हर घर में दीप जलाओ हर घर भगवा लहराओ करो स्वागत श्री राम प्रभु का भाग्य सब अपने जगाओ खुल गए भाग्य हमारे पधारे श्री राम प्रभु द्वारे हमारे बच्चे, बूढ़े,युवा सभी राम राम गुण गाओ खिल जाए

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कविता

अतिथि सत्कार

कार्यक्रम में आये अतिथि का सत्कार है , फूल और गुलदस्ता से अतिथि का सत्कार है , हर क्षण , हर पल आये अतिथि का सत्कार है , चाय , नाश्ता , कॉफी से अतिथि का सत्कार है , कार्यक्रम में आये हुए अतिथि का सत्कार है । सॉल और चादर ओढ़ाकर अतिथि का सत्कार

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कविता

आज का समाज

आज का समाज चमकते स्क्रीन के पीछे, चेहरे छिपे हैं, सपनों के पीछे भागते, रिश्ते सिमटे हैं। शोर में डूबी चुप्पी, सच का आलम खोया, इंसानियत का आलम, बस किताबों में सोया। सड़कों पर भीड़ है, पर दिल हैं सुनसान, हर कदम पर सवाल, कहाँ गया इंसान? प्रगति की राह में, मूल्य पीछे छूटे, गर्व

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कविता

निरंजना डांगे की कविता – माता के कालरात्रि स्वरूप की महिमा

रग रग में आस्था भरे भक्ति ज्योत हृदय जले करे पूजन माता के नौ रूपो का मन में श्रद्धा सुमन पुष्प लिए नव रंग ,नव रूप, नव साज लिए मन में उमंग और हृदय उल्लास लिए सुने हम गाथा माता की मन में विश्वास लिए ये है गाथा मां दुर्गा की नव स्वरूपों की नाम

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कविता

पवन सुरोलिया “उपासक” की कविता – जरा ठहर जा जिंदगी……..!!

जरा ठहर ज्या ऐ जिंदगी, क्यूं भग रही है! जरा सुस्ता लेे, थकी सी लग रही है! क्यूं कर रही है जिद्द उम्र से……. जरा ख्याल रख अपना, उम्र भी ढल रही है!! तकाजा ए उम्र अब कुछ, मुनासिब नहीं है! चाहता है जिसको तूं वो, अब करीब नहीं है! उतर रही है ढलान में

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कविता

डॉ.राजीव डोगरा की कविता -आओ स्कूल चले

आओ हम स्कूल चले नव भारत का निर्माण करें। छूट गया है जो बंधन भव का आओ मिलकर उसको पार करें, आओ हम स्कूल चले ….. जाकर स्कूल हम गुरुओं का मान करें बड़े बूढ़ों का कभी न हम अपमान करें, आओ हम स्कूल चले……. जाकर स्कूल हम दिल लगाकर पढ़ेंगे मौज मस्ती और खेलकूद

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कविता

कुछ अनकही सी बाते

कुछ अनकही सी बाते है कुछ खामोश सी ये राते है है अजीब सी बेचैनी दिल में कैसी ये उलझती हुई सी राते है नींद कोसों दूर हुई चकोर की इन नयनों से जब जहन् ये ख्याल आया उसका चांद है चंदानी की आगोश मे अधरों पर खामोशी है और अंखियों में नीर धारा सरिता

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कविता

पढ़ लिख कर काबिल बनो,मै मांझी मांझा सभालु

पढ़ लिख कर काबिल बनो नारी तुम अपना भविष्य गढ़ों समझो मोल किताबों का और अपने लिए किताबें चुनो छोड़ों चूड़ी ,कंगन, गहने सारे माणिक, मोती ,कुंदन सारे छोड़ो अभी श्रृंगार सारे नारी तुम पहले चुनो अपने लिए किताबें ज्ञान का एक दीपक जलाकर कर लो रोशन,भविष्य के अंधेरे कदमों में हो चाहत बढ़ने की

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कविता

वो कौन…

वो कौन… वो कौन है जिसने माँ की हथेलियों में दुआओं की नर्मी महसूस न की? वो कौन है जिसने उसकी गोद में सिर रखकर सारे ग़म हवा में न उड़ा दिए? जिसे उसकी आँखों की चिंता एक घने दरख़्त जैसी न लगी, जिसके साए में हर दर्द बेमानी हो जाता है। माँ… जो थकती

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कविता

मुस्कुराहटें

मुस्कुराहटें मुस्कुराहटें हैं जादू जैसी, हर दिल को बहला जाती हैं, टूटे हुए अरमानों पर भी, उम्मीदों के फूल खिलाती हैं। बिखर जाए जहाँ उदासी, और छा जाए वीरानियाँ, मुस्कुराहटें वहीं आकर, सजा देती हैं कहानियाँ। नन्हे बच्चे की हँसी में, कोई जन्नत झलकती है, थके हुए चेहरे पे जैसे, चाँदनी-सी चमकती है। कभी ये

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कविता

देखा जो तूने मुझे पहली बार

देखा जो तूने मुझे पहली बार , हाथ में कलम व कागज लेके , साहित्यकार फुर्सत के क्षण में , नदी किनारे व बगीचा में कुछ , शब्दों की माला सजाते हैं वो , देखा जो तूने मुझे पहली बार । हर कोई पाठक मेरी रचना को , जब देखते तब तारीफ करते हैं ,

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कविता

मनोज कुमार व्यास की कविता – भारत भूमि कोटि-कोटि प्रणाम

भारत भूमि कोटि कोटि प्रणाम हे भारत भूमि! तुम्हें कोटि कोटि प्रणाम तेरी सात्विक धरा को बारम्बार प्रणाम।। तेरे उत्तर में हिमालय पर्वतमाला है, जिसका हर जर्रा मन मोहनेवाला है यहाँ गंगा और यमुना का पावन संगम यहाँ सभी चराचर स्थावर और जंगम यहीं अवतरित हुए श्रीकृष्ण व राम। भारत ऋषियों मुनियों की तपोभूमि है

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कविता

मां दुर्गा

मां दुर्गा प्यारी मैया मेरी आ जाओ मेरे द्वार जीवन मेरा कर दो भव सागर पार मैया हम जन्म से तेरे है भक्त प्यारे तू सदा जीवन के दुख मिटा दे हमारे मैया तुमसे ही है यह जीवन हमारा मेरी मैया तुम ही हो मेरा जीवन सहारा मैया हम तेरे बालक बड़े अल्पज्ञानी मैया यें

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कविता

1.औंधा घड़ा (मूर्खता) ,2.कविताएं कुछ कहती है

कविता १ औंधा घड़ा (मूर्खता) वाह री बिटिया तू गजब करे है औंधे घट (मटका)में नीर भरे है नफरत की इस वैली (घाटी)में तू प्रीत का बहता झरना ढूंढे हैं वाह री बिटिया तू गजब करे है औंधे घट में नीर भरे है कोन रख विश्वास तू मन में कांटो मध्य भीं फूल ढूंढे है

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कविता

कवि वीरेंद्र कुमार की कविता – साहस

आओ जागे नींद से फैला है दिनकर का मनहर आलोक मिटा अन्धकार हुआ धरा पर उजियारा आओ करे साहस चले राह करे मन से मन की बात मिले हम हो मिलन मिल कर गाये मंगल गान बना रहे साहस से मान न डरें न डरायें बनाये धरा को साहस से मन भावन सुन्दर उपवन हो

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कविता

स्कूल चलो

स्कूल चलो चलो बच्चो, स्कूल चलो, ज्ञान की ज्योति जलाने चलो। अक्षर-अक्षर सीखेंगे हम, नव उजियारा पाएंगे हम। किताबों में छिपे हैं मोती, इनसे होगी मन की ज्योति। गिनती, कविता, खेल अनोखे, शिक्षा देंगे रूप अनूठे। माँ-बाबा का सपना प्यारा, पढ़-लिख बनना सितारा। आओ मिलकर वचन निभाएँ, नित्य स्कूल को रोज़ जाएँ। “विद्या ही सबसे

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कविता

चलो याद आया

चलो याद आया* तुम मुझे याद मत आया करो देखते आँसू मत बहाया करो नफरत भी आजमाया करो एक समय ने ही संभाला था हर समय को आजमाया करो। देख लेंगे हम बस दिल को समझाया करो न हरकत न कोई दहसत को भुलाया करो जब मेरी याद आती है आँखों भींगाया करो एक वक्त

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कविता

माँ , खौंच्छा, कसूरवार,

#मां कल बालकनी में, मादा कबूतर को अपने नन्हों को सुरक्षित करते देखा शांत भाव से अपने पंख फैलाकर चूजों को आलिंगन किए देखा वह बेजुबान पक्षी हर मुसीबत से डटने को तैयार है क्योंकि वह मां है जब तक उसके बच्चे उड़ना नहीं सीखते हैं तबतक वह करूणामयी मां उनकी पहरेदारी करती है अपने

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कविता, लघुकथा

सत्य कि झलक दिखाने वाला

उत्साह हूँ आनंद हूँ अंधकार को चीरता रवि हूँ सत्य की झलक दिखाने वाला मित्रों मैं एक कवि हूँ सत्य पथ पर चलता हूँ आलोचना से कब डरता हूँ प्रेरित हो इस जगत से अपनी रचनाये लिखता हूं दिखाता सबकुछ समाज का धरती पर समाज का छवि हु सत्य की झलक दिखाने वाला मित्रो मैं

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कविता

माँ का आँचल है संसार

मां का आंचल है संसार जिसमें है दुनिया का प्यार धूप लगे तो मां का आंचल घनी छांव बन जाता है भूख लगे तो मां का आंचल बच्चे का व्यंजन बन जाता है मां का आंचल प्रेम की छाया मां का आंचल प्रेम की धार मां के आंचल में सब सुख हैं मां का आंचल

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कविता

तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने

तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने , हथेली में रेखाएं नहीं रंग होते हैं शामें बतियाती हैं , सहर संग खतों से भी झरते हैं , पारिजात के पुष्प तुम्हारे साथ रहकर जाना मैंने , कितना सुकून देती है , दुखों की चोरी कितना ज़रूरी है , किसी मोड़ पर ठहरना भी केवल मौन से ,

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कविता

हाय रे ये गरीबी……..!!

गरीबी…….!! अक्सर राह चलते बदतर हालात में भिखारी मिल जाते हैं! उनकी जिंदगी नर्क से भी अधिक बदतर होती हैं, जो उनके पिछले जन्मों के कुकर्म घोर पाप का दंड हैं, जो आज वर्तमान जीवन में विवश होकर लाचारी में जिंदगी काट रहे हैं…..!! कलम…. आतुर हो उठ चल पड़ी और चंद पंक्तियों को धागे

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कविता

बरसों पहले मैं छोटा था

शीर्षक:- मैं छोटा था……!! बरसों पहले मैं छोटा था! भीतर में चंचलता ना मन खोटा था!! बढ़ती उम्र से मुझमें बदलाव आया! नंगा घूमता था वस्त्र धारण कर आया!! बिन बुलाए प्रीत लगाई जाती थी! वो ठहाका था यारों, जब एक हाथ से ताली बजती थी! आलम ऐ वक्त वो भी देखा है हमनें यारों…..

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स्वर्णिम काव्य-कथा प्रतियोगिता

रचना – 1 रचना का शीर्षक-गृह लक्ष्मी बिन घर भी सूना लगता है। नारी जहां पूंजी जाए देवों का निवास हो, नारी जिस घर में सुख समृद्धि का वास हो। नारी बिन तो सब कुछ अधूरा लगता है, गृह लक्ष्मी बिन घर भी सूना लगता है।। 1/नारी हांड़ मांस का पुतला मात्रा नहीं है, अपनी

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कविता

अपना नव वर्ष मनाएंगे

अपना नव वर्ष मनाएंगे हवा चली पश्चिम की सारे कुप्पा बन कर फूल गये सन ईस्वी तो याद रहा अपना संबत भूल गये चारों तरफ नये साल का ऐसा मचा है हो-हल्ला बेगानी शादी में नाचे जैसे दिलदीवाना अब्दुल्ला धरती ठिठुर रही सर्दी से घना कुहासा छाया है कैसा यह नववर्ष है जिससे सूरज भी

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कविता

अनकहे जज़्बात

शब्द अधूरे लब्ज़ अधूरे, तुम बिन अधूरे है सुर सारे संगीत के मेरे आकर बस जाओ जो तुम इसमें गुनगुनाऊं मै तुमको इसके हर सुर में कुछ शब्दो में तुझे निहारूं कुछ में तेरा मासूम सा चेहरा कुछ सुरों में ढूंढू हंसी तेरी कुछ सुरों में वजह तेरी खामोशी की शब्द अधूरे लब्ज़ अधूरे तुम

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कविता

मै हु अन्न का दाता

मै हु अन्न का दाता पल पल पर मै आजमाया हु जाता सदी,गर्मी,बारिश में भी अडिग हो अपना कर्तव्य हु निभाता भीष्ण हो गर्मी , या हो ठिठुरती ठंडी सब जाते है हार जब जब मै अविरल सा कर्तव्य पथ पर हु चलता पसीने से मैं फसलों को सींचता कर परिश्रम अन्न उगाता दिन रात

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कविता

ये कैसी नमी !

उद्धस सी जमीं सूखी-बेजान सी धरा को, अचानक हुआ कुछ तरावट का एहसास धरा का मन प्रफुल्लित हर्ष से आनंदित हलाहल कर उठेगीं, फसल, हजार परन्तु शीघ्र ही खुशी सारी मायूसी में बदल गई धरा का कलेजा छलनी हो गया वह नमी तो थी एक कृषक की ,अश्रुधार।।

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कविता

मै नन्ही सी हु एक गुड़िया कांच सी बिखरी हुई एक गुड़िया

मैं नन्ही सी हु एक गुड़िया नाम दे दो मुझको तुम चाहे रानी, बानी चाहे तो मुनिया नासमझ सी नन्ही सी गुड़िया दुनियादारी से दूर ये गुड़िया मीठी सी चाशनी में घोल कर पिलाई थी जिसे जहर की पुड़िया कहानी हुई शुरु वहां से जहां होती है विश्वाश की डोरी तनिक भी आभास नहीं था

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