उम्र के इस पड़ाव पर, जब टाँगें लड़खड़ा रही थीं और आँखें धुँधला चुकी थीं, हेमराज ने कभी नहीं सोचा था कि उनके अतीत के पन्ने यूँ अचानक पलट जाएँगे। एक सामाजिक समारोह में, भीड़ के बीच उनकी नज़र एक महिला पर पड़ी। उसका चेहरा देखते ही उनकी साँस थम-सी गई। वह शक्ल सुमन से इतनी मिलती-जुलती थी कि कॉलेज के दिन आँखों के सामने तैरने लगे। अपनी भावनाओं को समेटते हुए हेमराज ने उससे पूछ ही लिया, “क्या तुम सुमन की बहन हो?” महिला ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “नहीं, मैं सुमन मौसी की भांजी सिया हूँ।” हेमराज का दिल जैसे तेज़ी से धड़कने लगा। एक अनजाने उत्साह के साथ उन्होंने फिर पूछा, “अरे, तो सुमन कहाँ है?”
सिया ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “मैं बुला देती हूँ मौसी को।” कुछ देर बाद सुमन वहाँ पहुँचीं। सफेद बाल, अनुभव की गहरी लकीरें, और समय के साथ निखरा एक अलग रूप देखकर हेमराज की आँखों में पुरानी स्मृतियाँ झिलमिला उठीं।
“अरे, मुझे पहचाना?” उन्होंने अधीरता से पूछा। “हम पैंतालीस साल पहले एक ही कॉलेज में पढ़ते थे।”
सुमन ने एक पल उनकी ओर देखा। हल्की मुस्कान के साथ बोलीं, “नहीं, सर, मैंने नहीं पहचाना आपको।”
हेमराज ठिठक गए। मानो खुद को समझाने लगे, “चलो, तुम पहचानोगी भी कैसे? शायद तुम्हें कुछ याद भी न रहा होगा। लेकिन एक हम हैं, जो तुम्हारा हॉस्टल, तुम्हारा क्लासरूम, तुम्हारा घर और वे पुरानी बातें अब तक याद किए बैठे हैं।” उनके शब्दों में दर्द और अधूरी ख़्वाहिशों की झलक साफ़ दिखाई दी। लेकिन सुमन का चेहरा शांत और स्थिर रहा।
“अच्छा, पढ़ते होंगे साथ में। पर मुझे सच में कुछ याद नहीं,” कहकर सुमन ने सिया का हाथ थामा और समारोह के दूसरे कोने की ओर बढ़ गईं। हेमराज की आँखों के सामने पैंतालीस साल पुराने ख़्वाबों के जहाज़ उड़ान भरते रहे, लेकिन समारोह के शोर में उनकी ध्वनि अनसुनी ही रह गई।
पता: गाँव- पखरोल, डाकघर- सेरा, तहसील-नादौन,
जिला -हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश-177038