साहिल और रोशन एक प्राइवेट कंपनी के साक्षात्कार के दौरान एक-दूसरे से मिले और पता चला कि रोशन भी उसी सोसाइटी में रहने आया है जहाँ साहिल रहता है। साक्षात्कार में दोनों का ही चयन हो गया और थोड़ी जान-पहचान के बाद वे साथ-साथ ऑफिस जाने लगे। मिलनसार होने के साथ ही उनके विचार भी मिलते थे, तो वे दोनों एक दिन छोड़कर अपनी-अपनी कार लाते और इस तरह से दोनों को करीब दो महीने हो गए थे।
एक दिन, ऑफिस जाते समय उन्होंने एक व्यस्त चौराहे पर एक दृष्टिहीन व्यक्ति को लाठी लेकर सड़क पार करने की कोशिश करते देखा। हालाँकि
ट्रैफ़िक लाइट हरी होने ही वाली थी, लेकिन रोशन ने उस व्यक्ति की मदद करने की इच्छा जताते हुए साहिल से रुकने को कहा। साहिल ने आपत्ति
जताई और कहा कि उन्हें ऑफिस के लिए देर हो रही है, लेकिन रोशन ने मुस्कुराते हुए कहा, “बस दो मिनट लगेंगे दोस्त, और हमें दुआएँ भी मिलेंगी।”
इससे पहले कि साहिल कुछ और कहता, रोशन कार से बाहर निकल चुका था। साहिल को कुछ मिनट तक इंतज़ार करना पड़ा, और तब तक वह रोशन को उस दृष्टिहीन व्यक्ति की मदद करते हुए देखता रहा। शाम को चाय पर जाते समय, साहिल ने सुबह की घटना को याद किया, तो रोशन ने कहा, “साहिल, एक बात है जो मैं किसी को नहीं बताता, लेकिन आज तुम्हें बता रहा हूँ। मैंने सात साल पहले एक दुर्घटना में अपनी आँखें खो दी थीं, और मुझे तीन साल तक कोई राह नज़र नहीं आई। फिर किसी के नेत्रदान से मुझे ये आँखें मिलीं और मेरी ज़िंदगी रोशनी से भर गई।”
रोशन ने अपनी कहानी पूरी करते हुए कहा, “सुबह मुझे ऐसा लगा जैसे मैं ही चौराहे पर खड़ा हूँ, और अब मैं जानता हूँ कि मुझे कौन-सी राह चुननी है।” इस कहानी को सुनकर साहिल अवाक रह गया और भावुक हो गया। रोशन ने चुप्पी तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा, “वैसे, सुबह इंतज़ार करने के लिए शुक्रिया! चलो, आज की चाय मेरी ओर से।” साहिल मुस्कुराया और बोला, “कोई बात नहीं, भाई! मैं भी कभी-कभी इंतज़ार करवा देता हूँ, बस अब चाय पिलाने के लिए ज़्यादा इंतज़ार मत करवाना।” यह कहते हुए दोनों ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे और चाय की टपरी की ओर चल दिए।
पता – विभोर व्यास ९०५, ख़ूनी पुल, गुरुद्वारा रोड,
थापर नगर , मेरठ – 250001